#Class 10 Science Chapter 13 हमारा पर्यावरण Notes PDF in Hindi

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10 Class Science Chapter 13 हमारा पर्यावरण notes in hindi

📚 Chapter = 13 📚
💠 हमारा पर्यावरण 💠
सत्र 202
4-25

TextbookNCERT
ClassClass 10
Subjectविज्ञान
ChapterChapter 13.
Chapter Nameहमारा पर्यावरण
CategoryClass 10 Science Notes
MediumHindi

अध्याय एक नजर में Class 10 Science Chapter 13

हमारा पर्यावरण : Science class 10th:Hindi Medium NCERT

Class 10 विज्ञान
पुनरावृति नोट्स
हमारा पर्यावरण
सारांश

  • पारितंत्र के विभिन्न घटक अन्योन्याश्रित होते हैं।
  • उत्पादक सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को पारितंत्र के अन्य सदस्यों को उपलब्ध कराते हैं।
  • जब हम एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर पर जाते हैं तो ऊर्जा का ह्रास होता है, यह आहार शृंखला में पोषी स्तरों को सीमित कर देता है।
  • मानव की गतिविधियों का पर्यावरण पर समाघात होता है।
  • CFCs जैसे रसायनों ने ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाया है। क्योंकि ओज़ोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (UV) विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है अतः इसकी क्षति से पर्यावरण को नुकसान पहुँच सकता है।
  • हमारे द्वारा उत्पादित कचरा जैव निम्नीकरणीय अथवा अजैव निम्नीकरणीय हो सकता है।
  • हमारे द्वारा उत्पादित कचरे का निपटान एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है।

CBSE/ NCERT कक्षा 10 विज्ञान
पाठ-13 हमारा पर्यावरण
पुनरावृति नोट्स

  • पर्यावरण का मतलब वह सभी चीजे होती हैं जो हमे घेरे रखती हैं। इसमें सभी जैविक तथा अजैविक घटक शामिल है। इसलिए सभी जीवों के अलावा इसमें जल व वायु आदि शामिल है।
  • पर्यावरण किसी भी जीव के जीवन और उसके विकास को उसके प्राकृतिक वास में प्रभावित करता है।
  • जैव-निम्नकरणीय पदार्थ चे पदार्थ होते हैं जो विघटित हो जाते हैं। जैसे कार्बनिक अवशेष, जबकि कुछ पदार्थ जैसे प्लास्टिक कुछ रसायन (डी.डी.टी उर्वरक) अक्रियाशील होते हैं और विघटित नहीं हो पाते, इन्हें अजीव-निम्नकरणीय पदार्थ कहते हैं।
  • वास्तव में अजीव-निम्नकरणीय पदार्थ:- पर्यावरण में लम्बे समय के लिए विद्यमान रहते हैं और परितंत्र के विभिन्न जीवों को हानि पहुँचाते है।
  • परितंत्र व इसके घटक– एक क्षेत्र के सभी जीव व अजैविक घटक मिलकर एक पारितंत्र का निर्माण करते हैं। इसलिए एक पारितंत्र जैविक (जीवित जीव) व अजैविक घटक जैसे तापमान, वर्षा, वायु, मृदा आदि से मिलकर बनता है।
  • परितंत्र
    • मानव निर्मित परितंत्र जैसे- खेत, जलाशय
    • प्राकृतिक परितंत्र
      • जलीय परितंत्र
        • समुद्री परितंत्र जैसे- सागर, समुद्र
        • स्वस्छ जल परितंत्र जैसे- नदी, तालाब आदि
      • भौमिक परितंत्र जैसे- जंगल, रेगिस्तान, घास के मैदान आदि
  • एक पारितंत्र में हम सभी जीवों को उनके रहने के तरीकों के आधार पर वर्गीकृत करते है। ये समूह है।
  1. उत्पादक: सभी हरे पौधे, नीले-हरे शैवाल अपना भोजन (शर्करा व स्टार्च) अकार्बनिक पदार्थों से सूर्य की रोशनी का प्रयोग करके (प्रकाश-संश्लेषण) बनाते हैं।
  2. उपभोगता:- ऐसे जीव जो अपने निर्वाह के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर करते हैं। दूसरे शब्दों में उत्पादकों द्वारा निर्मित भोजन का उपयोग करते हैं।
    उपभोगता
    • शाकाहारी– घास खाने वाले जैसे- गाय, हिरण
    • माँसाहारी– माँस खाने वाले शेर, चीता
    • परजीवी– दूसरे जीव के शरीर में रहने व भोजन लेने वाले – प्लासमोडियम
    • सर्वभक्षी– पौधे व माँस दोनों खाने वाले कौआ, कुत्ता
  3. अपघटक:- फफूँदी व जीवाणु जो कि मरे हुए जीव पौधे के जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में विघटित कर देते हैं। इस प्रकार अपघटक प्राकृतिक स्त्रोतो की भरपाई में मदद करते हैं।
    जैविक समूहों की एक ऊर्जा स्थानांतरण की श्रृंखला में व्यवस्था खाद् श्रृंखला को दर्शाता है। ये जैविक समूह उत्पादक, शाकाहारी व माँसाहारी है। जैसे –

T3

 

T2

 

T1

घास

हिरन

शेर

एक 3 चरणों वाली खाद् श्रृंखला

  • एक ख़ाद् श्रृंखला में, इन जैविक घटकों को जिनमें ऊर्जा का स्थानांतरण होता हैं, पौषी स्तर कहलाता है।
  • हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा का 1 प्रतिशत भाग जो पत्तियों पर पड़ता हैं, अवशोषित करते हैं।
  • एक खाद् श्रृंखला में ऊर्जा का स्थानांतरण एक दिशा में होता है।
  • एक खाद् श्रृंखला में पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में ऊर्जा के स्थानांतरण में लगातार गिरावट आती है।


ऊर्जा

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तृतीय उपभोक्ता
1kJ

10kJ

100kJ

1000kJ
ऊर्जा


पोषी स्तर

  • इस प्रकार अगले पोषी स्तर में 10 प्रतिशत ऊर्जा का स्थानांतरण होता हैं जबकि 90 प्रतिशत ऊर्जा वर्तमान पोषी स्तर में जैव क्रियाओं में उपयोग होती हैं।
  • खाद् श्रृंखला में हानिकारक रसायनों की मात्रा में एक पोष स्तर में जाने पर वृद्धि होती हैं। इसे जैव संर्वधन कहते हैं। जैसे-

घास

 

हिरण

 

शेर

(10 ppm)

(200 ppm)

(5000 ppm)

DDT

 

DDT

 

DDT

  • ऐसे रसायनों की सबसे अधिक मात्रा मानव शरीर में होती है।
  • अक्सर खाद् श्रृंखलाएँ आपस में प्राकृतिक रूप से जुड़ी होती है, जो कि एक जाल का रूप धारण कर लेता है, इसे खाद् जाल कहते है।
  • हर एक पोषी स्तर पर ऊर्जा का हनन बहुत अधिक होता है इसलिए चार पोषी स्तरों के बाद बहुत ही कम ऊर्जा बचती है।
  • सामान्यतः निचले पोषी स्तरों में बहुत बड़ी जनसंख्या होती हैं। उदाहरणार्थ – उत्पादकों की संख्या उपभोगताओं (शेर) की संख्या से ज्यादा होती हैं।

पर्यावरण की समस्याएँ:-

  • पर्यावरण में बदलाव में प्रभावित करता हैं और हमारी गतिविधियाँ भी पर्यावरण को प्रभावित करतीं हैं। इससे पर्यावरण में धीरे-धीरे गिरावट आती है, जिससे पर्यावरण की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जैसे – ओजोन परत का हृास च झंडे का निसुतारज

Class 10 Science Chapter 13

ओजोन परत का ह्रास

  • मुख्य रूप से ओजोन परत समताप मंडल मुख्य रूप से ओजोन परत समताप मंडल में पाई जाती हैं जो कि हमारे वायुमंडल का हिस्सा हैं। (समुद्र तल से 12 किमी 50 किमी ऊपर)
  • जमीनी स्तर पर ओजोन एक घातक जहर हैं।
  • ओजोन का निर्माण निम्न प्रकाश-रसायनिक क्रिया का परिणाम है।
    2→(1800∘���2000∘�)ℎ2�+� (आणिवक ऑक्सीजन का टूटना)
    O2 + O O3 (ओजोन)
  • ओजोन की परत पृथ्वी के चारो ओर एक रक्षात्मक आवरण हैं जो कि सूर्य के हानिकारक पराबैंगनी प्रकाश को अवशोषित कर लेती है। इस प्रकार से यह जीवों की स्वास्थ हानियों जैसे त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, कमजोर परिरक्षा तंत्र, पौधों का नाश आदि से रक्षा करती हैं।
  • 1985 में पहली बार अंटार्टिका में ओजोन परत की मोटाई में कमी को देखा गया, जिसे ओजोन छिद्र के नाम से जाना गया।
  • ओजोन की मात्रा में इस तीव्रता गिरावट का मुख्य कारक मानव संश्लेषित रसायन क्लोरोफ्लुओरो कार्बन को माना गया। इन रसायनों में उपस्थित एक क्लोरीन अणु 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है। उनका उपयोग शीतलन एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है।
    1987 में संयुकत राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) में सर्वानुमति बनी कि सीएफसी के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए (क्यतो प्रोटोकोल)
  • कचरा प्रबंधन(अपशिष्ट निपटान)
    आज के समय में अपशिष्ट निपटान एक मुख्य समस्या जो कि हमारे पर्यावरण को प्रभावित करती है। यदि वर्तमान में इसे नियोजित व गंभीर दृष्टि से हल नहीं किया गया तो यह समस्या हमारे पर्यावरण व अस्तित्व को गहरे संकट में डालने के लिए सक्षम हैं। निम्न विधियों के द्वारा कचरा प्रबंधन किया जाता है।
    1. खुली जगह कूड़ा एकत्रित करना
    2. कूड़ा भराव क्षेत्र
    3. पुनः चक्रण
    4. पुनः उपयोग
    5. कम्पोस्टिंग

अतिरिक्त जानकारी Extra Notes

Class 10 विज्ञान
पुनरावृति नोट्स
हमारा पर्यावरण
पारितंत्र के संघटक

सभी जीव जैसे कि पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव एवं मानव तथा भौतिक कारकों में परस्पर अन्योन्यक्रिया होती है तथा प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं। किसी क्षेत्र के सभी जीव तथा वातावरण के अजैव कारक संयुक्त रूप से पारितंत्र बनाते हैं। अतः एक पारितंत्र में सभी जीवों के जैव घटक तथा अजैव घटक होते हैं। भौतिक कारक; जैसे- ताप, वर्षा, वायु, मृदा एवं खनिज इत्यादि अजैव घटक हैं।
सभी हरे पौधों एवं नील-हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है वह उत्पादक कहलाते हैं।
वह जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं। उपभोक्ता को मुख्यतः शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी एवं परजीवी में बाँटा गया है।

आहार शृंखला एवं जाल
विभिन्न जैविक स्तरों पर भाग लेने वाले जीवों की यह शृंखला आहार शृंखला का निर्माण करती हैं (चित्र)।

आहार शृंखला का प्रत्येक चरण अथवा कड़ी एक पोषी स्तर बनाते हैं। स्वपोषी अथवा उत्पादक प्रथम पोषी स्तर हैं तथा सौर ऊर्जा का स्थिरीकरण करके उसे विषमपोषियों अथवा उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध कराते हैं। शाकाहारी अथवा प्राथमिक उपभोक्ता द्वितीय पोषी स्तर; छोटे मांसाहारी अथवा द्वितीय उपभोक्ता तीसरे पोषी स्तर; तथा बड़े मांसाहारी अथवा तृतीय उपभोक्ता चौथे पोषी स्तर का निर्माण करते हैं (चित्र)।

हम जानते हैं कि जो भोजन हम खाते हैं, हमारे लिए ऊर्जा स्रोत का कार्य करता है तथा विभिन्न कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। अतः पर्यावरण के विभिन्न घटकों की परस्पर अन्योन्यक्रिया में निकाय के एक घटक से दूसरे में ऊर्जा का प्रवाह होता है। जैसा कि हम पढ़ चुके हैं, स्वपोषी सौर प्रकाश में निहित ऊर्जा को ग्रहण करके रासायनिक ऊर्जा में बदल देते हैं। यह ऊर्जा संसार के संपूर्ण जैवसमुदाय की सभी क्रियाओं के संपादन में सहायक है।
विभिन्न आहार शृंखलाओं की लंबाई एवं जटिलता में काफ़ी अंतर होता है। आमतौर पर प्रत्येक जीव दो अथवा अधिक प्रकार के जीवों द्वारा खाया जाता है, जो स्वयं अनेक प्रकार के जीवों का आहार बनते हैं। अतः एक सीधी आहार शृंखला के बजाय जीवों के मध्य आहार संबंध शाखान्वित होते हैं तथा शाखान्वित शृंखलाओं का एक जाल बनाते हैं जिससे ‘आहार जाल’ कहते हैं (चित्र)।

ऊर्जा प्रवाह के चित्र से दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, ऊर्जा का प्रवाह एकदिशिक अथवा एक ही दिशा में होता है। स्वपोषी जीवों द्वारा ग्रहण की गई ऊर्जा पुनः सौर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं होती तथा शाकाहारियों को स्थानांतरित की गई ऊर्जा पुन: स्वपोषी जीवों को उपलब्ध नहीं होती है। जैसे यह विभिन्न पोषी स्तरों पर क्रमिक स्थानांतरित होती है अपने से पहले स्तर के लिए उपलब्ध नहीं होती।

किसी भी आहार शृंखला में मनुष्य शीर्षस्थ है, अतः हमारे शरीर में यह रसायन सर्वाधिक मात्रा में संचित हो जाते हैं। इसे ‘जैव-आवर्धन कहते हैं। यही कारण है कि हमारे खाद्यान्न-गेहूँ तथा चावल, सब्जियाँ, फल तथा मांस में पीड़क रसायन के अवशिष्ट विभिन्न मात्रा में उपस्थित होते हैं। उन्हें पानी से धोकर अथवा अन्य प्रकार से अलग नहीं किया जा सकता।

*****

Class 10 विज्ञान
पुनरावृति नोट्स
हमारा पर्यावरण
हमारे पर्यावरण को प्रभावित करने वाले क्रियाकलाप

हम सब पर्यावरण का समेकित भाग हैं। पर्यावरण में परिवर्तन हमें प्रभावित करते हैं तथा हमारे क्रियाकलाप/गतिविधियाँ हमारे चारों ओर के पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। इस भाग में हम पर्यावरण संबंधी दो समस्याओं के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे, वे हैं- ओज़ोन परत का अपक्षय तथा अपशिष्ट निपटान।

ओजोन परत तथा यह किस प्रकार अपक्षयित होती है
ओज़ोन ‘O3, के अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनते हैं जबकि सामान्य ऑक्सीजन जिसके विषय में हम प्रायः चर्चा करते हैं, के अणु में दो परमाणु होते हैं। जहाँ ऑक्सीजन सभी प्रकार के वायविक जीवों के लिए आवश्यक है, वहीं ओज़ोन एक घातक विष है। परंतु वायुमंडल के ऊपरी स्तर में ओज़ोन एक आवश्यक प्रकार्य संपादित करती है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है। यह पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है। उदाहरणतः, यह गैस मानव में त्वचा का कैंसर उत्पन्न करती हैं।
वायुमंडल के उच्चतर स्तर पर पराबैंगनी (UV) विकिरण के प्रभाव से ऑक्सीजन (O2) अणुओं से ओज़ोन बनती है। उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन अणुओं (O2) को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन (O) परमाणु बनाते हैं। ऑक्सीजन के ये स्वतंत्र परमाणु संयुक्त होकर ओज़ोन बनाते हैं जैसा कि समीकरण में दर्शाया गया है।

1980 से वायुमंडल में ओज़ोन की मात्रा में तीव्रता से गिरावट आने लगी। क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (CFCs) जैसे मानव संश्लेषित रसायनों को इसका मुख्य कारक माना गया। इनका उपयोग रेफ्रीजेरेटर (शीतलन) एवं अग्निशमन के लिए किया जाता है। 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) में सर्वानुमति बनी कि CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए। अब यह अनिवार्य है कि दुनिया भर की सभी विनिर्माण कंपनियाँ CFC रहित रेफ्रिजरेटर बनाएँ।

कचरा प्रबंधन
हमारे द्वारा खाए गए भोजन का पाचन विभिन्न एंजाइमों द्वारा किया जाता है। किसी विशेष प्रकार के पदार्थ के पाचन/अपघटन के लिए विशिष्ट एंजाइम की आवश्यकता होती है। इसीलिए कोयला खाने से हमें ऊर्जा प्राप्त नहीं हो सकती। इसी कारण, बहुत से मानव-निर्मित पदार्थ जैसे कि प्लास्टिक का अपघटन जीवाणु अथवा दूसरे मृतजीवियों द्वारा नहीं हो सकता। इन पदार्थों पर भौतिक प्रक्रम जैसे कि ऊष्मा तथा दाब का प्रभाव होता है, परंतु सामान्य अवस्था में लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं।
वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटित हो जाते हैं, ‘जैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं। वे पदार्थ जो इस प्रक्रम में अपघटित नहीं होते ‘अजैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं। यह पदार्थ सामान्यतः ‘अक्रिय (Inert)’ हैं तथा लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं अथवा पर्यावरण के अन्य सदस्यों को हानि पहुँचाते हैं।
किसी भी नगर एवं कस्बे में जाने पर चारों ओर कचरे के ढेर दिखाई देते हैं। किसी पर्यटन स्थल पर जाइए, हमें विश्वास है कि वहाँ पर बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों की खाली थैलियाँ इधर-उधर फैली हुई दिख जाएँगी। पिछली कक्षाओं में हमने स्वयं द्वारा उत्पादित इस कचरे से निपटान के उपायों पर चर्चा की है। आइए, इस समस्या पर अधिक गंभीरता से ध्यान दें।
हमारी जीवन शैली में सुधार के साथ उत्पादित कचरे की मात्रा भी बहुत अधिक बढ़ गई है। हमारी अभिवृत्ति में परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। हम प्रयोज्य (निवर्तनीय) वस्तुओं का प्रयोग करने लगे हैं। पैकेजिंग के तरीकों में बदलाव से अजैव निम्नीकरणीय वस्तु के कचरे में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

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नोट्स, पाठ – 13 हमारा पर्यावरण (कक्षा दसंवी) | विज्ञान कक्षा 10
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