भारत में राष्ट्रवाद|NCERT Class 10 History Notes In Hindi

भारत में राष्ट्रवाद|NCERT Class 10 History Notes In Hindii. जिसमे हम प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत, असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन , नमक सत्याग्रह , किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों के आंदोलन , विभिन्न राजनीतिक समूहों की गतिविधियां आदि के बारे में पड़ेंगे ।

TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectHistory
ChapterChapter 2
Chapter Nameभारत में राष्ट्रवाद
CategoryClass 10 History
MediumHindi
भारत में राष्ट्रवाद

यह अध्याय CBSE,RBSE,UP Board(UPMSP),MP Board, Bihar Board(BSEB),Haryana Board(BSEH), UK Board(UBSE),बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, और यह उन छात्रों के लिए भी उपयोगी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं(UPSC) की तैयारी कर रहे हैं।

भारत में राष्ट्रवाद notes, Class 10 history chapter 2 notes in hindi

सामाजिक विज्ञान (इतिहास)अध्याय-2: भारत में राष्ट्रवाद

भारत में राष्ट्रवाद (समय के अनुसार एक नजर में)

  • 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ।
  • 1870 बंकिमचंद्र द्वारा वंदेमातरम की रचना हुई।
  • 1885 में कांग्रेस की स्थापना बम्बई (मुम्बई) में हुई। व्योमेश चंद्र बनर्जी कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष बने।
  • लार्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव किया।
  • 1905 में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता का चित्र बनाया।
वर्षघटना
1906आगा खान और नवाब सलीमुल्ला द्वारा मुस्लिम लीग की स्थापना
1907कांग्रेस का विभाजन नरम दल और गरम दल में
1911दिल्ली दरबार का आयोजन, बंगाल विभाजन का रद्द, राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित
1914प्रथम विश्व युद्ध का आरंभ
1915महात्मा गांधी की स्वदेश वापसी
1917चंपारण में नील कृषि आंदोलन और खेड़ा सत्याग्रह
1918अहमदाबाद में सत्याग्रह, प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति
1919रॉलट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन
1922चौरी-चौरा में हिंसक घटना, असहयोग आंदोलन वापस
1925काकोरी कांड
1928साइमन कमीशन का विरोध, लाला लाजपत राय की मृत्यु
1929भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेंबली पर बम फेंकना
1930साबरमती से दाण्ड़ी यात्रा, नमक कानून तोड़ना, सविनय अवज्ञा आंदोलन
1931गांधी-इरविन समझौता, सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
1932पूना पैक्ट
1933चौधरी रहमत अली द्वारा पाकिस्तान का विचार
1935भारत शासन अधिनियम, प्रांतीय सरकार का गठन
1939द्वितीय विश्व युद्ध का आरंभ
1940मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन, पाकिस्तान की मांग
1942भारत छोड़ो आंदोलन, “करो या मरो” का नारा
1945अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु हमला, द्वितीय विश्व युद्ध का अंत
1946कैबिनेट मिशन का आगमन, संविधान सभा के लिए प्रस्ताव
194715 अगस्त को भारत की स्वतंत्रता

राष्ट्रवाद का अर्थ / Meaning of nationalism

1. परिभाषा:

  • राष्ट्रवाद का मतलब है अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और एकता की भावना। यह एक समूह के लोगों के बीच एक सामान्य चेतना और विरासत को साझा करने की भावना है।

2. उत्पत्ति:

  • यूरोप में, राष्ट्रवाद राष्ट्र राज्यों के उदय के साथ जुड़ा है, जो विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों को सम्मिलित करता है।
  • भारत, वियतनाम जैसे उपनिवेशों में, उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों से जुड़ा है, जो अपने राष्ट्र की आजादी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।

3. महत्व:

  • राष्ट्रवाद लोगों को समाज में एक साथ आने के लिए प्रेरित करता है और एक समृद्ध और समृद्ध समाज की दिशा में मार्गदर्शन करता है।
  • यह राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक समृद्धि और अद्वितीयता को बढ़ावा देता है।

4. उदाहरण:

  • राष्ट्रवाद की भावना अनेक राष्ट्रों में देखी जा सकती है, जैसे भारत में गांधीवादी आंदोलन, जिसमें लोगों ने राष्ट्र की आजादी के लिए संघर्ष किया।

भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने के कारक / Factors for growth of feeling of nationalism in India

1. साहित्य, लोक कथाओं, गीतों व चित्रों के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रसार:

  • भारतीय साहित्य, लोक कथाओं, गीतों और चित्रों में राष्ट्रवाद की भावना को व्यक्त किया जाता है, जिससे लोगों में राष्ट्रीय आत्मभावना का विकास होता है।

2. भारत माता की छवि रूप लेने लगी:

  • भारतीय संस्कृति में भारत माता की पूजा और उसकी छवि को उचित महत्व दिया जाता है, जिससे राष्ट्रीय भावना मजबूत होती है।

3. लोक कथाओं द्वारा राष्ट्रीय पहचान:

  • भारतीय लोक कथाओं में राष्ट्रीय भावना को समझाने और प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है, जो लोगों के मन में एकता की भावना उत्पन्न करता है।

4. चिह्नों और प्रतीकों के प्रति जागरूकता:

  • राष्ट्रीय चिह्नों और प्रतीकों के उपयोग से लोगों को राष्ट्रवाद की महत्वपूर्णता का अनुभव होता है, जैसे राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान।

5. इतिहास की पुनर्व्याख्या:

  • भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाओं को फिर से विचार किया जाता है और उन्हें राष्ट्रीय भावना के प्रोत्साहन के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

पहला विश्वयुद्ध, ख़िलाफ़त और असहयोग / First World War, Khilafat and non-cooperation

प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर प्रभाव तथा युद्ध पश्चात परिस्थितियाँ :-

  1. रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी:
  • युद्ध के कारण, भारत ने अपने रक्षा संबंधी खर्चों में बढ़ोतरी की।
  1. ऋण और टैक्स में बढ़ोतरी:
  • रक्षा खर्चों को पूरा करने के लिए भारत ने ऋण लिये और टैक्स बढ़ाए।
  1. कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स की बढ़ाई:
  • अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए कस्टम ड्यूटी और इनकम टैक्स में वृद्धि की गई।
  1. महंगाई की बढ़ोतरी:
  • युद्ध के वर्षों में चीजों की कीमतें बढ़ी, जिससे आम आदमी को परेशानी हुई।
  1. जनरल मास्टरी के समय में ख़ास रुप से ग्रामीण क्षेत्रों में कई संघर्ष:
  • ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को सेना में जबरन भर्ती किया गया, जिससे उनमें गुस्सा उत्पन्न हुआ।
  1. उपज की कमी:
  • युद्ध के कारण कई भागों में उपज की कमी हुई, जिससे भोजन की कमी हो गई।
  1. फ़्लू की महामारी:
  • युद्ध के बाद फ़्लू की महामारी ने समस्याएँ और गंभीरता में वृद्धि की।
  1. जनगणना के अनुसार मौतें:
  • 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी के कारण लाखों लोगों की मौत हुई।

सत्याग्रह का विचार / Idea of satyagraha

सत्याग्रह का अर्थ

  • सत्याग्रह एक ऐसा जन आंदोलन है जो सत्य और अहिंसा के प्रति आधारित होता है। इसका मुख्य उद्देश्य न्याय, समाजिक परिवर्तन, या किसी अन्य मानवाधिकार के लिए सत्य को प्रमुख बनाना होता है। सत्याग्रह अहिंसा, आत्म-नियंत्रण, और समर्पण के माध्यम से प्रभावी रूप से किया जाता है।

महात्मा गांधी के सत्याग्रह का अर्थ

  • महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को अपने जीवन का मौलिक तत्व बनाया और उसके माध्यम से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। उनका मानना था कि सत्य और अहिंसा का पालन करते हुए ही समस्याओं का समाधान संभव है। उन्होंने सत्याग्रह को शक्ति का प्रमुख स्रोत माना और यहाँ तक कहा कि यदि कोई व्यक्ति सच्चाई और न्याय के लिए संघर्ष करता है, तो उसे अपने ऊपर हिंसा उत्पन्न करने वाले से लड़ने की जरूरत नहीं होती। गांधीजी ने सत्याग्रह को एक शक्तिशाली और प्रभावी नैतिक तंत्र माना और इसे अपने स्वतंत्रता संग्राम का माध्यम बनाया। उनकी सत्याग्रही आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महात्मा गाँधी द्वारा भारत में किए गए सत्याग्रह के आरंभ

  1. सत्याग्रह के आधार
  • महात्मा गांधी ने 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और उनकी जन आंदोलन की उपन्यास पद्धति को ‘सत्याग्रह’ के नाम से जाना जाता है।
  1. चंपारण (बिहार) की आंदोलन
  • 1917 में भारत में सबसे पहले चंपारण में दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ नील की खेती करने वाले किसानों को महात्मा गांधी ने प्रेरित किया।
  1. खेड़ा (गुजरात) की आंदोलन
  • 1917 में खेड़ा में गुजरात के किसानों को कर में छूट दिलवाने के लिए महात्मा गांधी ने उनके संघर्ष में समर्थन दिया। यहाँ पर किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे।
  1. अहमदाबाद (गुजरात) की आंदोलन
  • 1918 में अहमदाबाद में कपड़ा कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के समर्थन में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आंदोलन किया।

रॉलट ऐक्ट 1919 :-

1. मुख्य प्रावधान:

  • रॉलट ऐक्ट के मुख्य प्रावधान में शामिल था कि राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रखा जाएगा।

2. उद्देश्य:

  • इस ऐक्ट का मुख्य उद्देश्य भारत में राजनीतिक गतिविधियों का दमन करना था।

3. अन्यायपूर्णता:

  • रॉलट ऐक्ट अन्यायपूर्ण था क्योंकि इससे भारतीयों की नागरिक आजादी पर प्रहार किया गया और इसे भारतीय सदस्यों की सहमति के बिना पास किया गया।

4. परिणाम:

  • महात्मा गांधी के नेतृत्व में 6 अप्रैल को एक अखिल भारतीय हड़ताल का आयोजन किया गया।
  • विभिन्न शहरों में रैलियाँ और जूलूस हुए।
  • रेलवे वर्कशॉप्स में कामगारों का हड़ताल हुआ।
  • दुकानें बंद हो गईं।
  • स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
  • बैंक, डाकघर और रेलवे स्टेशन पर हमले हुए।

रॉलैट ऐक्ट 1919 (विस्तार से) :-

1. पारित होने का समय:

  • रॉलैट ऐक्ट 1919 को इंपीरियल लेगिस्लेटिव काउंसिल द्वारा 1919 में पारित किया गया था।

2. भारतीय सदस्यों का विरोध:

  • भारतीय सदस्यों ने इस ऐक्ट का समर्थन नहीं किया लेकिन फिर भी यह पारित हो गया।

3. प्रमुख प्रावधान:

  • रॉलैट ऐक्ट ने सरकार को राजनैतिक गतिविधियों को कुचलने के लिए असीम शक्ति प्रदान की।
  • इसके तहत बिना ट्रायल के ही राजनैतिक कैदियों को दो साल तक बंदी बनाया जा सकता था।

4. गांधीजी के आंदोलन:

  • 6 अप्रैल 1919 को रॉलैट ऐक्ट के विरोध में महात्मा गांधी ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शुरुआत की।
  • भारी समर्थन प्राप्त होने के बावजूद, अंग्रेजी हुकूमत ने कठोर कदम उठाए।
  • कई स्थानीय नेताओं को बंदी बनाया गया और महात्मा गांधी को दिल्ली में प्रवेश करने से रोका गया।

जलियावाला बाग हत्याकांड की घटना :-

1. घटना का परिचय:

  • 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।
  • इसके कारण लोगों ने सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया।
  • मार्शल लॉ का लागू होना और उसकी कमान जेनरल डायर को सौंप दी गई।

2. जलियावाला बाग में हत्या:

  • 13 अप्रैल को जलियावाला बाग में एक मेले में लोग इकट्ठे हुए थे।
  • बाग चारों तरफ से बंद था और निकलने के रास्ते संकीर्ण थे।
  • जेनरल डायर ने निकलने के रास्ते बंद करवा दिए और भीड़ पर गोली चलवाई।
  • इस हमले में सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई।

3. सरकार का रवैया:

  • सरकार का रवैया बड़ा क्रूर था, जिससे हिंसा फैल गई।

4. महात्मा गांधी का प्रतिक्रियात्मक आंदोलन:

  • महात्मा गांधी ने हिंसा के खिलाफ अपना आंदोलन वापस लिया।
  • वे हिंसा का समर्थन नहीं करते थे और नॉन-कोपरेशन आंदोलन को शुरू किया।

जलियावाला बाग हत्याकांड का प्रभाव :-

1. लोगों के आंदोलन:

  • भारत के बहुत सारे शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए।
  • हड़तालें होने लगीं और लोग पुलिस के खिलाफ मोर्चा लेने लगे।

2. सरकार का रवैया:

  • सरकार ने निर्ममतापूर्ण रवैया अपनाया।
  • लोगों को अपमानित और आतंकित किया गया।

3. सत्याग्रहियों का प्रतिक्रियात्मक आंदोलन:

  • सत्याग्रहियों को जमीन पर नाक रगड़ने के लिए मजबूर किया गया।
  • उन्हें सड़क पर घिसकर चलने और सारे ‘ साहिबों ‘ को सलाम करने के लिए मजबूर किया गया।

4. जबरदस्ती और हिंसा:

  • लोगों को कोड़े मारे गए और गुजरांवालां के गांवों पर बम बरसाए गए।

आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता :-

1. राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता:

  • रॉलैट सत्याग्रह का विस्तार राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में मदद करेगा।
  • हिंदू और मुस्लिम समुदायों के साथ आंदोलन में एकता के बिना आंदोलन की सफलता संभावना कम हो सकती है।

2. नेतृत्व की आवश्यकता:

  • आंदोलन के विस्तार के लिए नेतृत्व की महत्ता होगी।
  • एक समर्थ और प्रेरणादायक नेता के द्वारा संगठित आंदोलन संभव होगा।

3. सामाजिक विश्वास की बढ़त:

  • आंदोलन के विस्तार से लोगों के बीच सामाजिक विश्वास और सहयोग की भावना बढ़ेगी।
  • इससे आंदोलन की ताकत में वृद्धि होगी।

4. सरकार के प्रति दबाव:

  • विस्तारित आंदोलन से सरकार को अधिक दबाव महसूस होगा।
  • सरकार को लोगों की माँगों को सुनने और उनका समाधान करने के लिए मजबूर किया जा सकेगा।

5. सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा:

  • आंदोलन के विस्तार से सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा फैलेगी।
  • लोगों के बीच समाजिक और आर्थिक न्याय की मांग बढ़ेगी।

6. राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रति जागरूकता:

  • आंदोलन के विस्तार से लोगों में राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
  • इससे स्वतंत्रता संग्राम को समर्थन मिलेगा और स्वतंत्रता की मांग और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती मिलेगी।

खिलाफत का मुद्दा :-

1. शब्द का अर्थ:

  • खिलाफत शब्द “खलीफा” से लिया गया है, जो ऑटोमन तुर्की का सम्राट और इस्लामिक विश्व का आध्यात्मिक नेता था।

2. प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार:

  • प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद, खिलाफत पर अफवाह फैल गई कि उस पर अनुचित शर्तें थोपी जाएंगी।

3. खिलाफत समिति का गठन:

  • मार्च 1919 में अली बंधुओं ने बम्बई में एक खिलाफत समिति का गठन किया।
  • इस समिति का मुख्य उद्देश्य तुर्की के खिलाफत की रक्षा करना था।

4. उद्देश्य:

  • खिलाफत समिति ने तुर्की के खिलाफत को समर्थन प्रदान करने का उद्देश्य रखा था।
  • यह समिति भारतीय मुस्लिम समुदाय के बीच एकता और आध्यात्मिक संगठन को बढ़ाने का प्रयास करती थी।

5. राष्ट्रीय एकता का साधन:

  • खिलाफत समिति के माध्यम से, भारतीय मुस्लिम समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता बढ़ने का प्रयास किया गया।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सामर्थ्य और एकता की भावना को उत्पन्न करना था।

महात्मा गांधी ने क्यों खिलाफत का मुद्दा उठाया :-

1. रॉलट सत्याग्रह की असफलता:

  • महात्मा गांधी ने रॉलट सत्याग्रह के असफल होने के बाद, एक और जनांदोलन की आवश्यकता को महसूस किया।

2. जनसंघटन की आवश्यकता:

  • गांधीजी को लगा कि एक अधिक व्यापक और सशक्त आंदोलन के लिए हिंदू और मुस्लिमों के बीच एकता की आवश्यकता है।
  • खिलाफत मुद्दे को लेकर सामने आए गंभीर समस्याओं का सामाजिक संघर्ष में मिलान व एकता के लिए एक मंच प्रदान किया।

3. एकता का संदेश:

  • महात्मा गांधी ने खिलाफत मुद्दे को उठाकर एकता और सद्भावना का संदेश दिया।
  • उन्होंने समझाया कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का महत्व है और इसे बढ़ावा देने के लिए खिलाफत मुद्दे का समर्थन किया।

4. विस्तारित आंदोलन:

  • गांधीजी को लगा कि खिलाफत मुद्दे का समर्थन करके, वह एक ब्रोडर और लार्जर स्केल जनांदोलन को उत्पन्न कर सकते हैं जो पूरे भारत में फैल सके।

हिंद स्वराज :-

  • महात्मा गांधी द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक, जिसमें भारत में ब्रिटिश शासन के असहयोग पर जोर दिया गया था।

असहयोग आंदोलन / Non-Cooperation Movement

महात्मा गाँधी ने स्वराज (1909) में उल्लेख किया कि भारतीयों का अंग्रेजों के साथ सहयोग उनके राज्य को बनाए रखने में मदद कर रहा है। उनके मानने के अनुसार, यदि अंग्रेजी सरकार के खिलाफ भारतीय सहयोग बंद हो जाए, तो उन्हें स्वराज प्राप्त करने में मुश्किल होगी।

आंदोलन के कारण :-

  • प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद, अंग्रेजों की शासन व्यवस्था का अत्यधिक शोषण।
  • अंग्रेज सरकार का स्वराज प्रदान करने में असहमति।
  • रॉलेट एक्ट का पारित होना, जिससे लोगों के न्याय के अधिकारों का कमजोर होना।
  • जलियावाला बाग हत्याकांड, जिसने लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ भावनाओं को उकसाया।
  • 1920 में कांग्रेस द्वारा कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव किया गया।

असहयोग आंदोलन के कुछ प्रस्ताव :-

  • उपाधियों की वापसी:

अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों को वापस लेने का प्रस्ताव।

  • संस्थाओं से बहिष्कार:

सिविल सेवा, सेना, पुलिस, कोर्ट, लेजिस्लेटिव काउंसिल और स्कूलों से बहिष्कार का प्रस्ताव।

  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार:

भारत में आयातित विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का प्रस्ताव।

  • संपूर्ण अवज्ञा आंदोलन:

यदि सरकार अपनी दमनकारी नीतियों को बदलने में नाकाम रही, तो संपूर्ण अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव।

असहयोग आंदोल से संबंधित कांग्रेसी अधिवेशन :-

  • सितंबर 1920:

असहयोग पर स्वीकृति को अन्य नेताओं द्वारा मिली।

  • दिसंबर 1920:

स्वीकृति पर मोहर लगाई गई और असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई।

आंदोलन के भीतर अलग – अलग धाराएँ :-

  • असहयोग-खिलाफत आंदोलन:

जनवरी 1921 में आंदोलन की शुरुआत हुई।

  • विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी:

आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया, परंतु प्रत्येक वर्ग की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं।

  • विभिन्न धाराएँ एवं स्वराज का अर्थ:

प्रत्येक समूह ने ‘स्वराज’ का अलग-अलग अर्थ लिया, जिसमें उनके सभी कष्ट और सारी मुसीबतें समाप्त होने की आशा थी।

शहरों में असहयोग आंदोलन का धीमा पड़ना :-

  • खादी के महंगे होने का प्रभाव:

खादी का कपड़ा अधिक महंगा था जबकि चक्की के कपड़े सस्ते थे।

गरीब लोग खादी को खरीदने में असमर्थ थे, जिससे असहयोग आंदोलन का प्रभाव धीमा पड़ा।

  • वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की कमी:

विद्यालयों और अदालतों में अंग्रेजों के प्रति वैकल्पिक संस्थानों की कमी थी।

इसके कारण लोगों को विरोध करने में धीमापड़ गया।

  • शिक्षा क्षेत्र में प्रभाव:

छात्रों और शिक्षकों ने सरकारी स्कूलों में वापस आना शुरू किया, जिससे आंदोलन का प्रभाव धीमा पड़ा।

वकीलों ने भी सरकारी अदालतों में काम करना छोड़ दिया, लेकिन यह प्रभाव भी धीमा रहा।

असहयोग आंदोल की समाप्ति :-

महात्मा गांधी द्वारा आंदोलन की समाप्ति का कारण चौरी चौरा की घटना थी। यहाँ इस घटना के बारे में विस्तार से बताया गया है।

चौरी चौरा की घटना

  • तारीख: फरवरी 1922 में
  • घटना का संक्षिप्त विवरण:

महात्मा गांधी ने नो टैक्स आंदोलन शुरू करने का फैसला किया।

बिना किसी उकसावे के प्रदर्शन में भाग ले रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियां चला दीं।

लोग अपने गुस्से में हिंसक हो गए और पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और उसमें आग लगा दी।

  • स्थान: उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में हुई थी।

चौरी चौरा की घटना के बाद, महात्मा गांधी ने आंदोलन की समाप्ति का निर्णय लिया। उन्होंने आंदोलन को वापस ले लिया क्योंकि उन्हें लगा कि विवादास्पद और हिंसक तरीके से आंदोलन आगे बढ़ाना सही नहीं होगा और इससे आंदोलन का उद्देश्य खो सकता है।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर / Towards civil disobedience movement

सविनय अवज्ञा आंदोलन :-

1921 के अंत के दौरान, आंदोलन के हिंसक होने के कारण गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया। इस समय कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी जनांदोलन से थक जाने के कारण राज्यों के काउंसिल के चुनावों में हिस्सा लेने का समर्थन किया। राज्य के काउंसिलों का गठन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 के तहत हुआ था। कई नेताओं का मानना था कि सिस्टम का भाग बनकर अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाग लेना भी महत्वपूर्ण है।

  • नेताओं के मतभेद
  • कांग्रेस के नेताओं के बीच प्रांतीय परिषद चुनाव में हिस्सा लेने के विषय में मतभेद हुआ।
  • सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया ताकि प्रांतीय परिषद के चुनाव में हिस्सा ले सकें।
  • आर्थिक मंदी का प्रभाव
  • विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण कृषि उत्पाद की कीमतों में भारी गिरावट आई।
  • इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण इलाकों में भारी उथल-पुथल हुई।

साइमन कमीशन :-

  • साइमन कमीशन का गठन (1927)
  • ब्रिटेन में साइमन कमीशन का गठन 1927 में हुआ।
  • उसका उद्देश्य भारत में सवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था।
  • कमीशन के भारत आने पर प्रदर्शन (1928)
  • साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हुआ।
  • कांग्रेस ने इसे विरोध किया क्योंकि उसमें किसी भी भारतीय की शामिलता नहीं थी।
  • लाहौर अधिवेशन (1929)
  • दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ।
  • इसमें पूर्ण स्वराज के संकल्प को पारित किया गया।
  • स्वाधीनता दिवस (1930)
  • 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया।
  • इस दिन को संपूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष का आह्वान किया गया।

नमक यात्रा और असहयोग आंदोलन (1930) :-

  • महात्मा गांधी की माँगें (जनवरी 1930)
  • महात्मा गांधी ने लार्ड इरविन के समक्ष 11 मांगे रखी।
  • ये मांगे विभिन्न तबकों से जुड़ी थीं, जैसे उद्योगपतियों और किसानों की मांगें।
  • सबसे महत्वपूर्ण मांग नमक के कर को खत्म करने की थी।
  • लार्ड इरविन की प्रतिक्रिया
  • लार्ड इरविन ने किसी भी मांग को मानने की तैयारी नहीं दिखाई।
  • नमक यात्रा (12 मार्च 1930)
  • महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को नमक यात्रा की शुरूआत की।
  • नमक का उल्लंघन (6 अप्रैल 1930)
  • 6 अप्रैल 1930 को नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया गया।
  • यह घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत थी।

गाँधी इर्विन समझौते की विशेषताएँ :-

  • समझौते की तारीख:
  • 5 मई 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ।
  • आंदोलन का थामना:
  • समझौते के अनुसार, सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया गया।
  • अत्याचारों की जाँच:
  • समझौते में शामिल योजनाओं में से एक यह था कि पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों की निष्पक्ष जाँच की जाए।
  • नमक पर करों की हटाई:
  • समझौते के अनुसार, नमक पर लगाए गए सभी करों को हटाया जाना चाहिए।

आंदोलन में किसने भाग लिया?

  • गांधीजी और उनके अनुयायी:
  • गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक अपने अनुयायियों के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
  • ग्रामीण समुदाय:
  • गुजरात के अमीर पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट आंदोलन में सक्रिय थे।
  • व्यापारिक वर्ग:
  • व्यापारियों और उद्योगपतियों ने आंदोलन का समर्थन किया, आयातित वस्तुओं की खरीद और बिक्री से इनकार करके।
  • औद्योगिक श्रमिक:
  • नागपुर क्षेत्र के औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने भी आंदोलन में भाग लिया, जैसे रेलवे कर्मचारियों, डॉक वर्कर्स, और छोटा नागपुर के खनिज।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य घटनाएं :-

  • नमक कानून का उल्लंघन:
  • देशभर में लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन किया।
  • नमक को बनाने और बेचने पर शुल्क लगाया गया था, जिसका उल्लंघन किया गया।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार:
  • आंदोलनकारियों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
  • विदेशी कपड़े, शराब, आदि को विरोध किया गया।
  • शराब की दुकानों की पिकेटिंग:
  • आंदोलनकारियों ने शराब की दुकानों को बंद किया और उनके खिलाफ प्रदर्शन किया।
  • शराब की खासतूर पर दुकानों के बहिष्कार किया गया।
  • वन कानूनों का उल्लंघन:
  • आंदोलनकारियों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया।
  • वनों को अनाधिकृत तरीके से काटा जा रहा था, जिसका विरोध किया गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया :-

  • कांग्रेस नेताओं का हिरासत में लिया गया:
  • कांग्रेस के नेताओं को हिरासत में लिया गया और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई।
  • निर्मम दमन:
  • सरकार ने आंदोलनकारियों के प्रति निर्मम दमन किया।
  • प्रदर्शनकारियों को बाराती हिरासत में लिया गया और उन्हें बर्बरता से बाधा दी गई।
  • शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर आक्रमण:
  • शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर भी आक्रमण किया गया और उन्हें बाधा दी गई।
  • महिलाओं व बच्चों की पिटाई:
  • सरकारी अधिकारियों ने महिलाओं और बच्चों की पिटाई की और उन्हें उत्पीड़ित किया।
  • गिरफ्तारी:
  • लगभग 1,00,000 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया और उन पर कार्रवाई की गई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति लोगों और औपनिवेशिक सरकार ने की प्रतिक्रिया :-

  • सरकारी कानूनों को भंग करना:
  • लोगों ने सरकारी कानूनों को भंग करना शुरू कर दिया।
  • यह उनका विरोध और आंदोलन का माध्यम था।
  • कठोरता से काम:
  • सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोरता से काम लिया।
  • इसमें लोगों के खिलाफ हिरासत और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर हिंसा का प्रयोग शामिल था।
  • हजारों जेल गए:
  • आंदोलनकारियों को हिरासत में लेने के लिए सरकार ने हजारों को जेल भेजा।
  • इससे लोगों की भावनाओं में और भी उत्तेजना बढ़ी।
  • गाँधीजी को कैद कर लिया गया:
  • महात्मा गाँधी को भी कैद कर लिया गया, जो आंदोलन के मुख्य नेता थे।
  • इससे आंदोलन का नेतृत्व कमजोर होने का दावा किया गया।
  • जनता की भाग लेने की बढ़ती उत्सुकता:
  • इन सख्त कार्रवाईयों के बावजूद, लोगों की भाग लेने की उत्सुकता में वृद्धि हुई।
  • अब जनता ने आंदोलन में भाग लेने का अधिक साहस दिखाया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की विशेषताएँ :-

  • आपातकालीन प्रतिक्रिया:
  • इस बार, लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए भी आह्वान किया गया।
  • यह आंदोलन विभिन्न विषयों पर सामाजिक परिवर्तन की मांग कर रहा था।
  • नमक कानून का उल्लंघन:
  • देश के विभिन्न भागों में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।
  • इससे सामान्य लोगों की भागीदारी बढ़ी और आंदोलन की शक्ति में वृद्धि हुई।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार:
  • आंदोलन में लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और उनका उपयोग न किया।
  • यह राष्ट्रीय उत्थान के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दिखाता है।
  • किसानों और चौकीदारों का सहयोग न करना:
  • किसानों ने लगान और चौकीदारों ने कर चुकाने से इनकार किया।
  • यह उनकी खुदरा विरोधात्मक असहमति को प्रकट करता है।
  • वन कानूनों का उल्लंघन:
  • वनों में रहने वाले लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया और अपने अधिकारों की रक्षा की।
  • इससे आंदोलन में वन्यजीवों के संरक्षण की मांग भी उभरी।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका :-

  • सत्याग्रह में भाग लेना:
  • औरतों ने बहुत बड़ी संख्या में गांधी के नमक सत्याग्रह में भाग लिया।
  • उन्होंने समाज के साथियों के साथ एक साथ खड़े होकर अपने अधिकारों की रक्षा की।
  • यात्रा में भाग लेना:
  • हजारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए यात्रा के दौरान घरों से बहार आ जाती थीं।
  • वे सड़कों पर उतरकर नारे लगाती और अपनी आवाज को बुलंद करती थीं।
  • आंदोलन में भाग लेना:
  • उन्होंने जलूसों में भाग लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों की पिकेटिंग की।
  • यह उनकी उत्साही भूमिका को दर्शाता है जो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही थी।
  • जेल में जाना:
  • कई महिलाएँ जेल भी गईं, जहां उन्होंने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखा।
  • वे अपने प्रियजनों और समाज के लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत बनीं।
  • राष्ट्र की सेवा:
  • ग्रामीण क्षेत्रों की औरतों ने राष्ट्र की सेवा को अपना पवित्र दायित्व माना।
  • उन्होंने वन्यजीवों और समाज के दुर्बल वर्गों के प्रति समर्पितता दिखाई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन कैसे असहयोग आंदोलन से अलग था :-

  • असहयोग आंदोलन में लक्ष्य ‘ स्वराज ‘ था लेकिन इस बार ‘ पूर्ण स्वराज की मांग थी।
  • असहयोग में कानून का उल्लंघन शामिल नही था जबकि इस आंदोलन में कानून तोड़ना शामिल था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ :-

  • अनुसूचित की भागीदारी नहीं थी:

अनुसूचित जाति और वर्ग के लोगों की भागीदारी नहीं थी, क्योंकि कांग्रेस इनके हितों की अनदेखी कर रही थी।

इससे आंदोलन का राष्ट्रीय स्वरूप समझने में कठिनाई आई।

  • मुस्लिम संगठनों का उत्साह:
  • मुस्लिम संगठनों द्वारा सविनय अवज्ञा के प्रति खास उत्साह नहीं था, क्योंकि कांग्रेस ‘हिंदू महासभा’ जैसे हिंदू धार्मिक संगठनों के करीब आने लगी थी।
  • इससे आंदोलन की सामाजिक एकता में कमी आई और समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बढ़ा।
  • संदेह और अविश्वास:
  • दोनों समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था, जिससे आंदोलन की सफलता पर प्रभाव पड़ा।
  • इससे आंदोलन की अधिकतरता और सामाजिक अधिकार की मांग के विश्वास की कमी हो गई।

1932 की पूना संधि के प्रावधान :-

  • दमित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें:
  • पूना संधि के अनुसार, दमित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति के नाम से जाना गया) को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिली।
  • इससे उन्हें राजनीतिक प्रक्रियाओं में अधिक सामान्यता का मौका मिला।
  • मतदान क्षेत्रों में होने वाला मतदान:
  • हालांकि, इन आरक्षित सीटों के लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था।
  • यह प्रावधान दमित वर्गों को सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में शामिल करने का एक प्रयास था।

सामूहिक अपनेपन का भाव :-

वे कारक जिन्होने भारतीय लोगों में सामूहिक अपनेपन की भावना को जगाया तथा सभी भारतीय लोगों को एक किया।

  • चित्र व प्रतीक:
  • भारत माता की प्रथम छवि बंकिम चन्द्र द्वारा बनाई गई।
  • यह छवि राष्ट्र को पहचानने में मदद करती है और राष्ट्रीय एकता की भावना को जगाती है।
  • लोक कथाएँ:
  • राष्ट्रवादी घूम घूम कर इन लोक कथाओं का संकलन करने लगे।
  • ये कथाएँ परंपरागत संस्कृति की सही तस्वीर पेश करती हैं और राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देती हैं।
  • चिन्ह:
  • उदाहरण: झंडा – स्वदेशी आंदोलन के दौरान स्वदेशी भाव को प्रकट करता है।
  • यह राष्ट्रीय अभिवादन का प्रतीक है और राष्ट्रीय एकता को प्रकट करता है।
  • इतिहास की पुनर्व्याख्या:
  • भारतीय महसूस करने लगे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाना चाहिए।
  • यह भारतीय गर्व को मजबूत करता है और राष्ट्र की उत्थान भावना को प्रोत्साहित करता है।
  • गीत जैसे वंदे मातरम:
  • बंकिम चन्द्र द्वारा लिखा गीत, मातृभूमि की स्तुति के रूप में है।
  • इसका गाना स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को जोड़ता है और राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रोत्साहित करता है।

आशा करते है इस पोस्ट भारत में राष्ट्रवाद|NCERT Class 10 History Notes In Hindi में दी गयी जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित होगी । आप हमें नीचे Comment करके जरुर बताये और अपने दोस्तों को जरुर साझा करे। यह पोस्ट भारत में राष्ट्रवाद|NCERT Class 10 History Notes In Hindi पढ़ने के लिए धन्यवाद ! आपका समय शुभ रहे !!

NCERT Notes

स्वतंत्र भारत में, कांग्रेस पार्टी ने 1952 से 1967 तक लगातार तीन आम चुनावों में जीत हासिल करके एक प्रभुत्व स्थापित किया था। इस अवधि को 'कांग्रेस प्रणाली' के रूप में जाना जाता है। 1967 के चुनावों में, कांग्रेस को कुछ राज्यों में हार का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 'कांग्रेस प्रणाली' को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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